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जीवन में नक्षत्रों का महत्व : क्या नक्षत्र वास्तव में हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं?

By Acharya Soni Pandey •

जीवन में नक्षत्रों का महत्व : क्या नक्षत्र वास्तव में हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं?

जीवन में नक्षत्रों का महत्त्व ?

भारतीय ज्योतिष में नक्षत्र का अत्यंत महत्त्व है। किसी भी व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक फैले षोडश अर्थात्‌ सोलह संस्कारों में नक्षत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हम जिसे मुहूर्त कहते हैं, उसके मूल में नक्षत्र ही है!

किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही उसका जन्म-नक्षत्र मान लिया जाता है तथा वह नक्षत्र पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से जिस राशि के अंतर्गत आता है, वही राशि उस व्यक्ति की जन्म-राशि मान ली जाती है |

नक्षत्र का भी एक स्वामी ग्रह मान लिया गया है, इसलिए जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह की दशा या महादशा में उस व्यक्ति का जन्म हुआ, यह कहा जाता है। फिर ग्रहों के क्रमानुसार उस व्यक्ति के जीवन में उन ग्रहों की महादशाएं आती रहती हैं। (तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण आयुर्वेद, रामायण वाल्मीकि कृत् )

भारतीय ज्योतिष में नक्षत्रों का विशद्‌ अध्ययन किया गया है। यह भी माना गया है कि नक्षत्र जातक की कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल के साथ-साथ नाना प्रकार की व्याधियों के भी कारक बनते हैं।

नक्षत्रों पर विस्तृत अध्ययन करने के पूर्व यह समझा जाए कि आखिर नक्षत्र हैं क्या ? नक्षत्रों और तारों का क्या संबंध है ? इसी प्रकार राशियाँ और ग्रहों के साथ उनके रिश्ते कैसे हैं ?

नक्षत्र का शाब्दिक अर्थ क्या है ? 'नक्षत्र' संस्कृत भाषा का शब्द है तथा उसकी व्याख्या करते हुए कहा

गया है-न द्रति न सरति इति जक्षत्र-जो न हिले, न चले, वह नक्षत्र है।

नक्षत्र तारों के समूह :-

पाश्चात्य विश्वकोशों में कहा गया है कि चीनी, अरब, बेबीलोनिया--निवासी और मिस्री वे पहले लोग थे, जिन्होंने आकाश में नजर आने वाले तारों के समूहों में किसी विशिष्ट आकृति को आरोपित कर उन्हें नाम दिया है। (संभवतः उन्होंने भारतीय प्राचीन वेदों-उपनिषदों आदि का ज्ञान नहीं पाया इसलिए ऐसा लिखा है)

यहीं पर नक्षत्रों एवं तारों का अंतर स्पष्ट हो जाता है। वास्तविकता तो यह है कि नक्षत्र सूर्य, चंद्र, मंगल की तरह कोई अकेली इकाई नहीं होते। दरअसल नक्षत्र कुछ तारों के समूह का ही विशिष्ट नाम हैं।

नक्षत्र बनाम तारे :-

आकाश में नक्षत्रों की रचना तारे करते हैं। ये तारे क्या हैं ? सबसे पहले हमें तारों के बारे में परिचय प्राप्त करें फिर नक्षत्रों, राशियों या ग्रहों और उनमें क्या अंतर है, यह अपने आप स्पष्ट हो जाएगा ।

तारे क्या हैं ?

रात्रि के समय स्वच्छ आकाश में असंख्य तारे नजर आते हैं। लेकिन अंतरिक्ष में इनके अतिरिक्त और भी तारे हैं, जो हमें नजर नहीं आते, दूसरे शब्दों में जिनका प्रकाश या जिनकी रोशनी हम धरती वासियों को नजर नहीं आती पर वे मौजूद हैं, और जैसे-जैसे अंतरिक्ष विज्ञान उन्नति कर रहा है, जैसे-जैसे खगोलशास्त्री निरंतर शोधों में लगे हुए हैं, हमारे सामने नये-नये तारों की, नये-नये ग्रहों की और नये-नये सौर मंडलों की उपस्थिति स्पष्ट होती जा रही है।

क्या तारों में ऊर्जा होती है ?

हाँ, तारों में ऊर्जा होती है, तारे की मध्यावस्था में हाइड्रोजन गैस के अणु निरंतर परस्पर निकट आकर एक नयी गैस-हीलियम मैस-की रचना करने लगते हैं। हर बार जब हाइड्रोजन गैस के अणुओं से हीलियम गैस का कोई अणु बनता है तो प्रकाश एवं ताप के रूप में उससे ऊर्जा का प्रवाह होता है।

किसी भी तारे द्वारा निःसृत की जाने वाली अपार ऊर्जा के लिए करोड़ों टन हाइड्रोजन गैस हीलियम गैस में परिवर्तित होती है।

तारों की यह ऊर्जा कहाँ जाती है ?

अधिकांश तारों की ऊर्जा अंतरिक्ष में समाहित हो जाती है, लेकिन जो थोड़ी ऊर्जा शेष रहती है, उससे तारा निरंतर गर्म होने लगता है। जब तारों के मध्य का तापमान 400 मिलियन डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है तो तारा फैलने लगता है और हीलियम के अणु, और भारी हीलियम अणुओं की संरचना के लिए परस्पर मिलने लगते हैं ।

क्या तारों में विस्फोट भी होता है ? यदि यह सम्मिलन क्रिया तीव्र गति से होती है तो तारों में विस्फोट हो जाता है और अंतरिक्ष में उसके तत्व विलीन होने लगते हैं।

क्या तारों का अवसान भी होता है ?

हाँ, तारे भी जन्म-मरण की प्रक्रिया के शिकार होते हैं! जब तारों में विस्फोट होता है तो तारे के जीवन का यह चरण 'सुपरनोवा' चरण कहलाता है | हालांकि ऐसा यदा-कदा ही होता है।

अंत में जब तारों के तमाम हाइड्रोजन 'ईंधन' का इस्तेमाल हो चुका होता है तो वह सिकुड कर 'व्हाइट ड्वार्फ' अर्थात्‌ 'श्वेत वागन' का रूप धर लेता है और धीरे-धीरे ठंडा होकर धूमिल पड़ने लगता है, यह उसके 'अवसान' का संकेत माना गया है।

तारों के जन्म और मरण की इस क्रिया में करोड़ों--करोड़ों वर्ष लगते हैं।

इसीलिए मनुष्य की पिछली अनेक पीढ़ियों ने उन्हें सदा एक-सा देखा है। उन्हें वे स्थिर प्रतीत होते हैं, 'न क्षरति, न सरति' ।

तारों के आकार के बारे में जानें :-

टिम-टिम करते या झिलमिलाते इन तारों में कुछ तारे तो इतने विशाल हैं कि यदि हमारे सूर्य को उनके मध्य रखा जाए तो हमारी पृथ्वी भी उनमें समा जाएगी। कुछ तारे सूर्य से भी छोटे हैं।

तारों का वर्गीकरण :-

धरती से दिखायी देने वाले तारों के प्रकाश के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया गया है। तारों की चमक को 'मेग्नीट्यूड' कहा जाता है पर इस मेग्नीट्यूड से किसी भी तारे की असली चमक का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

तारों के इन प्रकाश के आधार पर उन्हें तरह-तरह के नाम दिये गये हैं।

तारों के ऐसे अध्ययनों ने खगोल शास्त्रियों को अंतरिक्ष को तो समझने में मदद की ही है, थे उनके प्रकाश से उनके 'हल्के' या भारी होने का भी पता लगा सकते हैं।

क्या तारे रेडियो तरंगें भी प्रवाहित करते हैं?

1968 में खगोलशास्त्रियों ने ऐसे तारों का पता लगाया जो नियमित रूप से रेडियो-तरंगें प्रवाहित कर रहे थे तथा एक क्षण में या सेकंड में तेरह बार चमकते थे। कुछ तारों की ऐसी ही रेडियो तरंगों के कारण इस अनुमान ने भी जन्म लिया कि शायद अंतरिक्ष में कहीं कोई और सभ्यता है, जो इस तरह की रेडियो तरंगें प्रवाहित कर रही है।

तारों के संबंध में यह संक्षिप्त विवरण ही है। पर तारों के संबंध में जानना इसलिए जरूरी है कि वे ही 'नक्षत्र' की रचना करते हैं।

नक्षत्र की परिभाषा हमने पहले पढ़ी कि "न क्षरति, न सरति"। ऐसी बात नहीं है। चूँकि तारों की स्थिति में करोड़ों-करोड़ों वर्षों में परिवर्तन आता है, अतः वे धरती पर रहने वाले नश्वर मनुष्य को, जिसका जीवन इन तारों के जीवन की तुलना में किसी बुलबुले से भी बेहद गौण होता है, स्थिर नज़र आते हैं।

तो फिर क्या तारे ही नक्षत्रों का आधार हुए?

हाँ, तारे ही नक्षत्रों का आधार हैं। मनुष्य हजारों वर्षों से इन तारों को देखता आया है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने आकाश में रात्रि में चमकने वाले इन तारों के समूहों में कुछ आकृतियाँ आरोपित कर दीं। कालांतर में वे नक्षत्र या Constellation (कांस्टेलेशन) कहलाने लगे। प्राचीन काल में इन नक्षत्रों की सहायता से नाविक और यात्री दिशा निर्धारित करते थे। इसीलिए अरब में इन्हें 'मनाज़िल' कहा जाने लगा।

नक्षत्रों का नामकरण कब हुआ और उसका आधार क्या है?

माना जाता है कि प्राचीन यूनानियों को लगभग 49 कांस्टेलेशन (नक्षत्रों) का ज्ञान था और उनका नामकरण उन्होंने अपने वीर नायकों और देवताओं के नाम पर किया था। बाद में रोमन खगोलशास्त्रियों ने उन्हें जो नाम दिए, वे आज तक प्रचलित हैं।

इनमें से एक प्रसिद्ध कांस्टेलेशन 'उर्सा मेजर (Ursa Major)' या 'ग्रेट बीयर (Great Bear)' है। (भारतीय लोग इसे सप्तऋषि तारामंडल कहते थे।)

इसके सात मुख्य तारे एक हल के फाल की आकृति बनाते हैं। इसे 'सप्तऋषि' भी कहा जाता है।इस समूह के दो तारे Pointer Stars (प्वाइंटर स्टार्स) कहलाते हैं, क्योंकि वे सदैव ध्रुव तारे की ओर संकेत करते हैं। ध्रुव तारे को 'पोलारिस (Polaris)' भी कहा जाता है तथा यह सदैव उत्तरी ध्रुव के समीप दिखाई देता है।आज के खगोलशास्त्रियों ने 88 कांस्टेलेशन (नक्षत्रों) की पहचान की है। इनमें से 23 दक्षिणी गोलार्द्ध के ध्रुव दक्षिण में हैं।